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आताताईयो का गुण अपराध होता है - Jagran Junction Forum

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उपन्यासकार भीष्म साहनी का उपन्यास ‘‘तमस‘‘ मे एक जगह पर किसी की हत्या का वर्णन मे कहा गया है, कि वह हत्यारा मोटे आकार का एक गलफुला ब्यक्ति को छुरा घोप कर हत्या करने के लिये उसका पीछा करता है वहॉ पर लेखक ने इंसान के एक मनोविज्ञान का परिचय कराया गया था, कि जिस इंसान को सजा दिया जाय उसका बार बार चेहरा नही देखना चाहिए। क्योकि उससे मोह पैदा होता है और फिर उसको सजा देने की स्वयं की क्षमता समाप्त हो जाती है। एैसा ही उस पात्र के साथ भी हुआ था, वह भी उसकी हत्या नही कर पाता है और वह वापस लौट कर चला आता है।

एैसी ही मनोबैज्ञानिकता इन दोनो अपराधियों के प्रति भी देखने को मिल रही है जिसके पक्ष में हमारे कुछ राजनेता वर्षाे से अफजल- कसाब तो कभी कसाब – अफजल जैसे शब्द सुन सुन कर ये इतने मोहित हो गये की इनकी फॉसी की सजा को मॉफ करने की वकालत भी करने लगे।

अपराधियो की रग – रग मे अपराध का रक्त बहता है। आखिर राजनेताओ के मोह से जो आश्वासन अतंकियो को मिला, उसमे वे जरा भी देर नही करना चाहते है। इसलिऐ अफजल को छुड़वाने की भरसक कोशिस में 7 सितम्बर को दिल्ली हाईर्कोट के पास बम विस्फोट करके अपनी आवाज बुलंद कर दी और उसके पीछे कई जाने चली गई।

सच मानिए तो इन हत्याओ का दुःख इन राजनेताओ को बिलकुल भी नही होता है। इन्हे तो बस अपनी राजनीति की रोटियॉ सेकने से मतलब है। ये दोनो अपराधियो को जब से गिरफतार करके जेल मे रखा गया है तब से लेकर आज तक इन पर कारोड़ो रूपये का खर्च हो चुके है। ये पैसा किसका है…….? देश की जनता का है।
अर्थात वे इन अपराधियो से अपनी जान भी गवाए और सजा के नाम पर जो जेल उन्हे मिली है उसमे उनकी देखरेख के पीछे इन बेगुनाहो की जेब का पैसा जो अपने देश को टेक्स के रूप मे देते आए है उससे इन अपराधियो की देखरेख मे करोड़ो रूपऐ खर्च किये जाते है। इनके नाम से ये करोड़ो रूपऐ जो पास होते है, उसमे भी भ्रष्टाचार अपनी हिस्सेदारी निभाता है।

इधर राजीव हत्याकाण्ड मामले के दोषियो की फॉसी सजा माफ करने की भी राजनीति हो रही है। तमिलनाडु विधानसभा मे प्रस्ताव पारित करके राष्ट्रपति से सजा माफी की अपील की गई है। जो लोग फॉसी जैसी सजा को खत्म करने की वकालत करना चहते है। मै उनसे यह जानना चाहता हॅू कि एक गुनहगार के पीछे इतने बेगुनाहो की जो हत्या हो रही है, क्या उनकी जिन्दगियो का कोई मोल नही है। कभी उनके बिछड़ते / टूटते हुऐ परिवारो के नजरिये से आपकी ऑखे ख्ुाली है।

दुःख से तो कोई भी नहीं बच सक्ता ये तो प्रकृति का नियम है कोई कितने ही सुख के सिंघासन पर बैठ जाऐ उसे दुःख का सामना करना ही पड़ेगा ही। लेकिन प्रकृति के बनाऐ इस नियम मे तानाशाहो को शामिल होेने का कोई हक नही है। फॉसी की सजा माफ करने का अर्थ है हिंसा को बढ़ावा देना। अर्थात अपराधी जितनी भी हत्याऐ करेगा/अपराध करेगा उसे यह मालूम होगा, कि कानून के नजरिऐ से मेरी जिन्दगी तो सुरक्षित ही है।

सजा का मूल उद्ेश्य – अपराध को खत्म करके अपराधी का सुधार करना है, किन्तु मुत्युदन्ड की स्थिति मे यह प्रश्न उठता है कि – अपराधी ही समाप्त हो जाऐगा तो सुधर की बात कहॉ बनेगी। लेकिन भारत मे तो फॉसी की सजा कू्रर से कू्रर व घिनौने मामले मे दी जाती है। क्योकि यह बात सिद्व है कि ‘‘आताताई का गुण अपराध होता है। वह अपना गुण कभी नही छोड़ सक्ता‘‘। इस बात का वर्णन हजारों वर्ष पहले ‘‘श्रीमद् भागवत् गीता‘‘ मे एैसे ही नही कर दिया गया है।

बिदेशो की अपेक्षा भारत मे अपराध बहुत ज्यादा है इसलिये हमे उन देशो के कानून से तुलना नही करना चाहिऐ हमारे देश मे आज भी बहन – बेटियॉ रात 8 बजे के बाद घर से बाहर नही निकलती है। इसके पीछे उनमे अपराध का खौफ है।

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

alkargupta1 के द्वारा
September 8, 2011

आम निर्दोष जनता ही इस आतंकवाद का निशाना बनती है और राजनीति के चलते अमरे राजनेता अपना उल्लू सीधा करते हैं कहीं पीड़ित परिवार को मुआवजा देने की बात करते हैं तो कहीं संवेदना से अपना काम चलते है……ये कभी भी समाप्त होने वाला नहीं….!


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