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रचनात्मक आकार देता है शब्दों का कारीगर

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शब्दों का कारवॉ चलता जाता है और वर्डस्मिथ { शब्दो का कारीगर } उन्हे चुन चुन कर एकत्रित करता जाता है । और तैयार कर देता है एक नई इबारत जो सारे जहॉ को मंत्रमुग्ध कर देती है। मैने अपने छोटे-मोटे लेखनी की शुरुआत राट्रीय पर्व – स्वतंत्रा दिवस, या गणतंत्र दिवस के समय स्कूलों में जो सांस्कृतिक प्रोग्राम होते थे, तो उस समय मै अपने लिऐ एक शाब्दिक कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करता था। कभी स्पीच या ‘‘स्कूल की तारीफ‘‘ इत्यादि पर शब्दो का कारीगर बन कर उस विषय को तैयार करता था। और तैयार होने के बाद उसका अर्थ निकलने के साथ साथ उस लेख में ‘‘आर्कषण‘‘ कितना है इसकी जॉच भी विशेष रूप से करता था। बिना आर्कषण के किसी भी लेख ,कहानी, कविता और स्क्रिप्ट को आज भी मै फाईनल रूप नही देता हूॅ।
मैंने बतौर एक लेखक के तौर पर अपने अंदर यह पाया कि एक शब्दों के कारीगर के रूप में मै अपने इन छोटे-मोटे प्रयासों से लेखन की शुरुआत की थी। लेकिन उन लेखों को एकत्रित करने के विषय में कभी नही सोचा था। जो लिखता था, लोगो से उसकी प्रतिक्रिया मिलते ही वहीं दफन कर देता था। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब कालेज मे दाखिला लिया तो ‘‘कामर्स‘‘ मेरा विषय था। कालेज मे दूसरे दिन की एक क्लास लगी ‘‘मर्केन्टाई लॉ‘‘ जो कि एक ‘‘थ्योरी‘‘ का विषय था। उसमें पहले ही दिन प्रोफेसर ने एक टॉपिक लिखने को दिया जो अगले दिन दिखाना था। उसे भी मैने एक लेख की तरह तैयार करके दिखाया। पर वहॉ एक सस्पंेस का माहौल बन गया। अटेन्डेन्स में मेरा नंबर सबसे पहले था और एक के बाद एक, स्टूडेन्टस को ‘‘मेडम‘‘ ने किसी को बढ़िया प्रयास तो किसी का कुछ नुख्स निकाल कर सबकी नोटबुक लौटा दी, पर उस दौरान 30 – 40 छात्रों के बीच मेरी नोटबुक नहीं मिल रही थी। मै तनाव महसूस कर रहा था। कालेज का अभी दूसरा ही दिन है और आज मेरी बदनामी तो होके ही रहेगी। मै मन ही मन क्लासरूम मै बैठ कर अपने आपको को उस शर्मिन्दगी भरे क्षण के आने का इंतजार कर रहा था। और मन मे हनुमान चालीसा की लाईने बुदबुदा रहा था। किसी तरह शर्मिन्दा न होना पड़े। अंत में मेरा नंबर आया तो जो सुनने को मिला, उससे एक पल के लिऐ मै कॅाप सा गया, परिणाम मे मेरे ‘‘उत्तर‘‘ की तारीफ क्लास में सबसे बढ़िया रूप मे की गई थी। मेरी हिम्मत नही हो रही थी कि मै अपनी नोटबुक जाकर मेडम से लेकर आऊॅ ,फिर भी हिम्मत करके दबे पैर वहॉ तक गया और नोटबुक लेकर आ गया।
करीब एक हफते बाद कालेज की तरफ से मेरे हॉथ में पहली बार एक डायरी हॉथ लगी, जो सभी स्टूडेंन्ट को दी गई थी। मैने सोचा इसमें क्या लिखूॅ……? दिमाग में डायरी का ख्याल आया, सो में मैंने पहले-पहल जो चीजें दर्ज कीं, वे वास्तव में पढ़ी हुई किताबों, की कुछ अच्छी लाईने उसमें लिखी। शेर – शायरियों से कोसो दूर रहता था। क्योकि शायरियॉ मुझे भाती नहीं थी। महापुरूषों के जीवन चरित्र और किसी के ब्यक्तित्व में उसका संधर्ष, यही सब मेरा पसंदीदा नजरिया था। बाद के सालों में इन डायरियों ने मेरी बहुत मदद की। फिर धीरे धीरे मैने अपने सहपाठियों के बीच पाया कि कुछ में इश्क का रंग सवार हो गया है और हो भी क्यों न कालेज की शुरूआत ही इसी रंग से होती है , इश्क नही तो पढ़ाई नहीं। अगर दोनो तरफ से स्वीकार हो गया तो फस्ट डिवीजन वर्ना सपलीमेन्ट्री । सपलीमेन्ªट्री भी न मिली तो अगले साल प्राईवेट परिक्षा जिन्दाबाद होती है। तो इस इश्क के रंग मे उस समय मोबाईल तो होता नही था। इसलिये इश्क करने वालों को अपनी भावनाऐ एकदूसरे से व्यक्त करने का सबसे सस्ता माध्यम ‘‘लवलेटर‘‘ था। छात्रो के सुसाईट केस मे उस समय पुलिष भी ‘‘लवलेटर‘‘ का सुराख ढूॅढती थी। जिसमे ‘‘अफेयर‘‘ से संबंधित शब्दों को ढूॅढा जाता था।
उस दौरान भी मुझसे कुछ लोगो ने अपने लवलेटर लिखवाया था। जो कि किसी को नही पता होता था, पर मुझे पता होता था, कि किसका किससे कनेक्शन है। इस बात की पूरी कहानी मै उस प्रेमी से सुनता था। कारण इस बीच मै उस प्रेमी के अंदाज से परिचित हो जाता था और उसके ही अंदाज में उस लवलेटर को लिख डालता था। और फिर एक साफ कागज में उसी के हैण्डराईटिंग मे लेटर लिखवाता था ताकि कल को ये कोई अपराध कर बैठे तो लवलेटर मे इसी की हैण्डराईटिंग मिले। हॉ इन सब कामों मे मै किसी का ‘‘लवगुरू‘‘ बनना पसंद नही करता था। क्योकि किसी की पर्सनल लाईफ में मै कोई रूचि नही रखता था, जो कि आज भी है।
इंसान के इन व्यौहारो से परिचित होने के बाद एक दिन मै आकाशवाणी स्टेशन गया वहॉ ‘‘युववाणी‘‘ प्रोग्राम के लिये एक ‘‘मेरी पसंद‘‘ नामक प्रोग्राम की स्क्रिप्ट लिख कर दिया जो कि एक गीतो भरा प्रोग्राम था। दो महीनो बाद मेरे घर पर रिकार्डिग की तारीख का एक लैटर आया, उसमे मै अपनी ‘‘रिकार्डिग‘‘ जैसा शब्द पढ़ कर, मुझे कुछ समझ में नही आया, सो मै उसी दिन आकाशवाणी चला गया, उस लेटर के बारे में पता करने के लिये। वहॉ प्रोग्रामर ने कहा ‘‘अच्छा हुआ जो आज ही आप इसे यहॉ ले आये आपकी रिकार्डिग तक आपका चेक आ जाऐगा‘‘। चेक का नाम सुन कर अच्छा लगा, लेकिन वे सब अपनी मजाकिया शैली मे मुझे अपनी चुटिकियों में भी लेने से नही चूके, बोले ‘‘बरखुर दार ये तो बताओ किसके प्रेम मे ये प्रोग्राम लिखा है‘‘। क्योकि प्रोग्राम गीतो पर आधारित था, इसलिये उसमे प्रेम का निचोड़ कुछ ज्यादा ही था। उनका मुझे चुटकियों में लेना स्वभाविक ही था। मै अपने ‘‘न‘‘ के जबाब मे वहॉ से चला आया। जब एक महीने बाद हम उस प्रोग्राम की रिकार्डिग करके निकले तो अपने हॉथ में 150 रूपयों का चेक लेकर आकाशवाणी से बाहर निकला। मेरी खुशी का ठिकाना नही था क्योकि वह मेरे लेखनी की पहली कमाई थी। यहीं से मेरे सपनों में पंख निकलने लगे थे। और ढेर सारे शब्दों की तलाश में जुट गया था।
प्रतियोगी परिक्षाओं की तैयारी के उद्देश्य से मै अपना जनरल नॉलेज बढ़ाने के लिये मै दिल्ली की एक ‘‘टॉपर्स इंडिया‘‘ नामक पत्रिका खरीदा उसमें भी एक निबंध प्रतियोगिता के बारे में पढ़ा। वह एक पत्रिका मासिक थी । उसमे भी मै पहली बार भाग लिया जिसका विषय था ‘‘राजनीति में प्रशासन की सत्यनिष्ठा‘‘ उस पर भी मेरा पूरे ऑल इंडिया में पहला नंबर लगा वो भी मेरे एक रिश्तेदार जो इलाहाबाद में रह कर प्रतियोगिता परिक्षा की तैयारी करते थे उन्होने उसे पढ़ा और हमे ‘‘जबलपुर‘‘ मे किसी के हॉथ सूचना भेजवाऐ थे , तब जाकर मै वह पत्रिका बुकस्टाल से खरीद कर पढ़ा था। पर उस प्रतियोगिता का प्रथम इनाम 300 रूपये आज तक नही मिला।
लेकिन अब इतना हो गया था कि अखबारो में मेरे लेख कहानियॉ छपने लगी थी। मै अपने अंदर एक लेखक के गुण को स्वीकार करने लगा था। ये शब्दो का समाज एक समय के बाद मेरी दिनचर्या बने गये थे । मेरे ब्यौहार को आकार देने में, मेरी रचनात्मकता को बनाये रखने में ये शब्द हमेशा मेरे पास होते है। और मुझमें एक नया प्रयोग करने की प्रेरणा हमेशा मुझे देते रहते है। क्योकि कहते भी है कि ‘‘भाषा विचारो की पोशाक होती है‘‘। जो कि सिद्व भी है यदि आपके पास अच्छे शब्दो का कलेशन है तो आपकी रचनानात्मकता कोई आपसे छीन नही सक्ता।
जब मै मुम्बई मे स्क्रिप्ट राईटर था तब भी यही शब्द मेरे जीवन में एक तरह से लेखकीय अनुशासन पैदा कर दिये दिये थे । दिन रात क्या होती है उसे भुला कर समय पर अपने कार्य को पूरा करना था। शब्दों ने मुझे अपने आसपास के परिवेश के बारे में संवेदनशील और सचेत होना सिखाया। मैंने नोट्स और तथ्यों को दर्ज करना सीखा। कभी कभी तो ऐसे लम्हे भी आऐ कि जिस पेपर के टुकड़े पर ‘‘वड़ापाव‘‘ रख कर मै खा रहा था, और खाते – खाते मेरी नजर उस पेपर की चंद लाईनो पर पड़ी जो मुझसे फेंके नही गये, उस तेल में भीगे पेपर को मै अपने हैण्ड बैग के एक ब्लाक में सम्हाल कर उसे रख लेता था। शायद एक लेखक के लिए यह बहुत जरूरी न हो, लेकिन निश्चित ही यह उसके लिए बहुत उपयोगी है।

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ashishshukla के द्वारा
August 6, 2011

शब्दों का कारवां चलता रहेगा और कारीगर एक नहीं अनेकों पैदा होते रहेंगे एक लेखक के लिये क्या जरूरी है और क्या नही पर इतना तो है कि वह शब्द किसी न किसी लाईन के लिये उपयोगी तो जरूर होगा जो उसकी रचना को ताकतवर बनाऐगा।


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